लक्ष्य बड़ा, लेकिन क्रियान्वयन कमजोर? योजना का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना है, ताकि महिलाओं और बच्चों को दूरस्थ स्रोतों से पानी लाने की समस्या से मुक्ति मिले। परंतु कई गांवों में पाइपलाइन अधूरी पड़ी है, टंकियां बनकर तैयार हैं लेकिन जल आपूर्ति शुरू नहीं हुई, और कहीं मोटर-पंप या विद्युत कनेक्शन के अभाव में व्यवस्था ठप है।
ग्रामीणों का कहना है कि “कागजों में काम पूरा दिखाया जाता है, मगर नलों में पानी नहीं आता।” कुछ स्थानों पर प्रारंभिक परीक्षण के बाद आपूर्ति बंद होने की शिकायत भी सामने आई है।
प्रशासन और जनप्रतिनिधियों पर सवाल ? स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि जिला स्तर पर संबंधित विभाग ने अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई। नियमित मॉनिटरिंग, गुणवत्ता जांच और समयबद्ध कार्ययोजना का अभाव दिखाई देता है। जनप्रतिनिधियों द्वारा भी योजना की प्रगति को लेकर ठोस समीक्षा बैठकें और सार्वजनिक रिपोर्टिंग कम ही देखने को मिली है।
यदि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद लक्ष्य से इतनी दूरी है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जवाबदेही तय क्यों नहीं हो पा रही?
आमजन की बढ़ती चिंता गर्मी के मौसम में जल संकट और गहराता है। हैंडपंपों का जलस्तर नीचे चला जाता है और टैंकरों पर निर्भरता बढ़ती है। ऐसे में लोगों के मन में प्रश्न है— घर तक स्वच्छ पेयजल कब पहुंचेगा? क्या अधूरे प्रोजेक्ट समय पर पूरे होंगे? और जिम्मेदारी तय कर पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित की जाएगी?


